कोरोना वायरस एक महामारी है या एक साधारण बिमारी

Covid-19 in hindi

कोरोना महामारी की सच्चाई

जैसा कि हम सभी जानते हैं, यह साल कोरोना वायरस की भयानक महामारी की कहर से जूझ रहा है। कोरोना वायरस जो चीन देश से फैलना शुरू हुआ और देखते ही देखते पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया। ना जाने कितने ही  देशों में लाखों लोग मौत के घाट उतर गए और कई लोग तो अभी भी बीमारी से जूझ रहे हैं | एक तरफ तो इस वायरस ने पुरे २०२० वर्ष को महामारी के रूप में घेर लिया है, जिससे सारे विद्यालय, कार्यालय, उद्योग, महाविद्यालय, बंद हो चुके थे ताकि संक्रमण से बचा जा सके और बीमारी को कुछ हद तक फैलने से रोका जा सके लेकिन कुछ महीनो बाद जब धीरे – धीरे lockdown से जुड़ी पाबंदियों में ढील आने लगी तो विद्यालय, महाविद्यालय को छोड़ कर बाकि सारे संस्थान खुल चुके हैं |

तो क्या यहाँ पर देश की नहीं, बल्कि पुरे विश्व की आवाम को ये सोचने की जरुरत नहीं है, कि शिक्षा संस्थानों से जुड़े पहलुओं  पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है  ? Social Media पर trends में चल रहे कोरोना वायरस पर मिथ्यक बातें जिसका कोई तुक नहीं है, क्या इन पर विरोध के बारे में सोचने की आवश्यकता नहीं है?

यह article आपको इन्ही सारी बातों पर गौर फरमाने के लिए बनाई गयी है। ताकि आप कोरोना वायरस के पीछे छुपे सच को जान सके और सतर्कता पूर्वक अपने खिलाफ हो रहे अन्याय का डट कर सामना कर सके। इसीलिए हमारे आर्टिकल का नाम भी है – कोरोना वायरस के पीछे छुपा सच |

कोरोना वायरस के इस भयानक दौर में ना जाने कितने ही लोग मनगढ़ंत बातें बना रहे हैं, झूठी अफवाएं फैला रहे हैं। कुछ अफवायें नीचे आप सबों को बताने जा रहीं हूँ ताकि आप इन बेकार की बातों को सच न मान बैठें -:

कोरोना महामारी को लेकर अफ़वाहे

(१) अफ़वाह – कोरोना वायरस मच्छर के काटने से फैलता है।

     हक़ीकत – अभी तक ऐसा कोई भी सबूत नहीं मिला है कि कोरोना वायरस मच्छर के काटने से फैल सकता है। यह respiratory वायरस है, जो संक्रमितव्यक्ति के खांसने या छींकने के दौरान दूसरे व्यक्ति तक पहुंचता है। ऐसे में social

distance या सामाजिक दूरी जरूरी है, खासतौर पर ऐसेव्यक्ति के संपर्क में आने से बचें, जिसे खांसी हो। हमें अपनी ओर से सावधानी रखनी चाहिए।

(२) अफ़वाह – कोरोना वायरस को ultraviolet disinfection lamp से ख़त्म किया जा सकता है।

हक़ीक़त – Ultraviolet disinfection lamp हाथों को स्वच्छ करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, क्योंकि UV radiation त्वचा के लिएहानिकारक होता है। इससे हमें जानलेवा बीमारी हो सकती है।

(३) अफ़वाह – Thermal Detector से कोरोना वायरस से ग्रस्त व्यक्ति का पता चल सकता है।

हक़ीक़त – Thermal Detector से सिर्फ यह पता चलता है कि व्यक्ति के शरीर का तापमान कितना है? तो फिर ये कैसे हो सकता है कि इससे कोरोना जैसे भयानक वायरस को मारा जा सके। व्यक्ति   के तापमान से यह पता चलता है कि उसे बुखार है या नहीं ?   

          

(४) अफ़वाह – Antibiotic का course लेने से वायरस के संक्रमण से बचाव संभव हो सकता है।

हक़ीक़त – Antibiotics वायरस से नहीं बल्कि बैक्टीरिया से हमें बचाते हैं। जानते हैं कि कोरोना वायरस है, इसलिए एंटीबायोटिक का इस वायरस पर कोई असर नहीं पड़ता। हाँ, अगर कोई व्यक्ति   

           अस्पताल में भर्ती है तो उसे अन्य संक्रमणों से बचाने के लिए एंटीबायोटिक दी जा सकती है। जिससे की वो बाकि संक्रमण से बच सके।

(५) अफ़वाह – यदि हम लहसुन का सेवन करते हैं तो हमारे शरीर पर वायरस का प्रकोप कम हो सकता है।

   हक़ीक़त – हम अच्छी तरह से जानते हैं कि लहसुन हमारे शरीर के लिए लाभकारी है। इसमें कुछ ऐसे तत्त्व होते हैं, जो शरीर के लिए लाभदायक है जैसे कि ब्लड सर्कुलेशन अच्छी तरह से होता है साथ   

           ही पेट से जुडी समस्याओं का भी समाधान होता है। लेकिन अभी तक हमें ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला है कि लहसुन खाने से कोरोना संक्रमण से बचा जा सकता है। हाँ, बहुत हद तक अपने  शरीर के immunity को कायम रख सकते हैं।

(६) अफ़वाह – शरीर पर एल्कोहल या क्लोरीन छिड़काव करने से कोरोना वायरस को नष्ट किया जा सकता है।

हक़ीक़त – अगर कोरोना वायरस व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर चुका है तो कोई भी स्प्रे, वायरस का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। बल्कि ऐसा करने से हमारे शरीर को नुकसान हो सकता है। एल्कोहल और      

           क्लोरीन स्प्रे खास जगहों पर ही किया जाता है और वो भी उन पर दिए गए निर्देशों के अनुसार जाता है।

विचार

चलिए ये सब बातें तो हुई fake news की, लेकिन इससे भी बड़ी-बड़ी तथ्य हैं जिनपर न सिर्फ विचार करने की जरुरत है बल्कि उनपर कठोर कदम भी उठाना लाज़मी है। ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी पर आज के संकट के बादल हमेशा न छाये रहे। गौर फ़रमा सकते हैं आप कि- कोरोना वायरस के संक्रमण के कारण विद्यालय, महाविद्यालय जैसी शिक्षण की संस्थाएं अभी भी lockdown की शिकार में है। क्या आने वाली भविष्य की पीढ़ियों के लिए उचित शिक्षा का एक लय में होना सही नहीं है? या फिर इसमें जो अभी रुकावट आयी है उस पर विचार करना और आने वाली पीढी के लिए ये जोखिम उठाना सही है?

# बच्चे तो खाने की वस्तुएं या फिर घूमने के लिए तो घर के बाहर जायेंगे ही फिर इसमें भी तो उन्हें खतरा है। तो फिर स्कूल जैसी संस्थाएं अभी तक बंद रखने का क्या तात्पर्य रह जाता है? उन्हें भी उचित नियम के साथ खोला जाना चाहिए ताकि सामाजिक दुरी जैसे नियम का उलंघन भी न हो और भविष्य की पीढ़ी के साथ कोई खेल न हो।

चाहे हम कितने भी नियम कानून क्यों न बना लें! बीमारी के फैलने का खतरा तभी टाला जा सकता है जब व्यक्ति इसकी गंभीरता को ना सिर्फ समझेंगे बल्कि आत्मसात करेंगे।फिर इन खोखले नियम और पाबंदियों का क्या मोल है? कुछ भी नहीं – बस दिखावे की दुनिया है।सभी लोगो को ज्यादातर हम देख सकते हैं कि मास्क का प्रयोग भी उचित प्रकार से नहीं करते हैं। मास्क तो जैसे उनके खेलने का कोई साधनं बन गया हो जिसे जैसे चाहे वैसे पहनते हैं। बचाव के लिए नहीं पहनते।

अब तक नियम, निति और शिक्षा की बात कर रहे थे अब थोड़ी अपनी नज़र और ध्यान दोनों हमारे नेशनल मीडिया पर डालते हैं। यह तो असमंजस की बात है जो आजकल हमारी मीडिया कर रही है। कोरोना वायरस के महामारी के कारण इतनी जानें गयी है शायद इनकी ज़िन्दगी का उनके नज़र में कोई महत्व नहीं है। हालात तो कुछ ऐसे ही बयां हो रहे हैं जिस तरह से उन्होंने सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु की घटना को पुरे राष्ट्रीय स्तर पर तवज्जो दे रखी है।

यह नहीं कहा जा सकता कि उनकी मृत्यु की घटना के विषय की चर्चा को ना दिखाएं।परन्तु जो आपातकाल की स्तिथि अभी बनी हुई है जो एक गंभीर समस्या है उस पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय सिर्फ एक suicide घटना को एहमियत देना कहाँ समझदारी हुई ? ना ही कोई ऐसी वीडियो वायरल हुई है जो यह दिखाती है कि कोरोना वायरस से किस तरह संक्रमण फ़ैल रहा है? या किस तरह से उनकी मृत्यु हो रही है? कोई भी लाइव वीडियो वायरल नहीं हुई है।आखिर ऐसा क्यों ?

वैसे तो उनके कैमरे की नज़र हमेशा stardom या फिर फिल्मस्टार के घर के बहार इर्द – गिर्द घूमते रहती है जैसे उनके घर की रखवाली की ज़िम्मेदारी उनको ही दी गयी हो। Filmstars के हर हरकत की पेशकश तो ऐसे की जाती है मानो उनसे बढ़कर और कोई तथ्य बचता ही नहीं है।

#GDP की रेटिंग जो दिन-प्रतिदिन घटती जा रही है जिससे हमारे देश की अस्तित्व जुडी हुई है जैसे – हमारे रीढ़ की हड्डी हमारे शरीर को एक मजबूती देती है ठीक उसी तरह जीडीपी रेटिंग देश की मजबूती का आधार है।

क्या इन् विषयों को सरल भाषा में देश की जनता को नहीं समझा सकते? जबकि वे जानते हैं की ज्यादातर देश की आबादी उनके न्यूज़ को किस तरह आज़माती है।इन महत्वपूर्ण विषयों पर जागरूकता को यदि वे बढ़ाते हैं तो देश के नागरिक भी देश की स्तिथि की ओर अपनी एहमियत को समझेंगे और हमारा देश कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ सकेगा |

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देश को स्वतंत्र हुए कितने ही दशक बीत गए किन्तु आज भी हम विकासशील अवस्था में ही है और उप्र से सबकी रूढ़िवादी सोच जो आज भी पुराने हालातों से ख़राब घड़ी की सुई की भांति अटकी हुई है। क्या इन सारे तथ्यों पर उनकी चेतना नहीं जगती?

चलिए उनकी चेतना नहीं जगती तो क्या हमारी भी चेतना या सोच या विचार करने की गति में लोहे की भांति जंग लग कर खोखली हो गयी है ? पढ़े -लिखे होने के बाद, इतनी आज़दी के बाद भी हम गुलामों की भांति अपनी सोच को क्यों बना कर रखे हैं?

हमारा भी कर्तव्य है- अपने देश के प्रति जागरूकता दिखाने की, साथ ही अधिकारहै वो भी मौलिक अधिकार जो आसानी से किसी भी हाल में छिना नहीं जा सकता।

भारतीय मीडिया के लिए 22 मार्च खास दिन बन गया | जो मीडिया संसद की कार्यवाही ‘कवर’ करने के लिये संसद की प्रेस से पूरे सदन पर नजर रखता है और समाज को उनके जन-प्रतिनिधियों व सरकार के विधायी कामों की जानकारी देता है, उस दिन स्वयं उसी पर सदन में गंभीर सवाल उठे | भारतीय संसद के उच्चसदन में चुनाव सुधार पर केंद्रित लंबी चर्चा के दौरान देश के चार प्रमुख विपक्षी नेताओं ने अपने दलों की तरफ से भारत में मीडिया की अंदरूनी संरचना, उसके रोल पर गंभीर सवाल उठाए |

संसद में मीडिया को लेकर चर्चा पहले भी हुई है पर इससे पहले कभी संसद में मीडिया पर इतने गंभीर और ठोस सवाल नहीं उठे | चुनाव सुधार पर चर्चा के दौरान जनता दल-यू के शरद यादव, माकपा के सीताराम येचुरी, कांग्रेस के आनंद शर्मा, बसपा के सतीशचंद्र मिश्र और कई अन्य नेताओं ने मुख्यधारा मीडिया के मौजूदा परिदृश्य और उसके क्रमशः तेजी से बदलते चरित्र पर सवाल उठाये और कई दृष्टांत भी पेश किये | पर संसद की इस मीडिया-चर्चा का भारतीय मीडिया, तमाम बड़े अखबारों और न्यूज चैनलों ने एक तरह से ‘ब्लैक-आउट’ किया | अगर राज्यसभा की कार्यवाही का LIVE TELECAST करने वाला राज्यसभा चैनल(RSTV) न होता तो देश की आवाम को मालूम तक नहीं पड़ता कि संसद में भारत के मुख्यधारा मीडिया पर कितने गंभीर सवाल उठाये गये !!!! यह बात बिल्कुल समझ में नहीं आई कि संसद के उच्च सदन की इतनी महत्वपूर्ण चर्चा, खासकर मीडिया की आलोचना वाले प्रसंग को देश के प्रमुख अखबारों या चैनलों ने छापने या प्रसारित होने लायक क्यों नहीं समझा गया?

क्या हमारे मीडिया को अपनी आलोचना से डर लगने लगा? क्या इस आरोप को वह पचा नहीं पा रहा है कि उसे आज सत्ता-संरचना का हिस्सा बताया जाने लगा है? इन सवालों पर चर्चा करने के बजाय इन्हें छुपाते या दबाते हुए वह सत्ता-संरचना की तरह असहिष्णुता क्यों दिखा रहा है?

अगर थोड़ा-सा और अपनी सोच पर गौर फ़रमाये तो कुछ घटनाएँ ऐसी भी घटी है जिनका जिक्र करने पर ही इंसानियत को चांटा मारने के समान है।

हम सभी अच्छे से वाकिफ है कि LOCKDOWN के दरमियान सारे नियमों की कठोरता से पालन करने के लिए और सुरक्षा का दायित्व पुलिस अधिकारीयों को दी गयी थी।  और नियमों के उलंघन करने पर जब पुलिस ने जनता को समझाने की कोशिश की तो कुछ लोगों ने पुलिस कर्मचारियों के खिलाफ ऐसा विरोध किया कि उन्हे सीधे मौत के दरवाजे तक पहुंचा दिया गया। कई पुलिस कर्मचारियों पर तो पत्थर, लाठियों की बरसात हो गयी थी। क्या हमारी आवाम की सोच इतनी गिर चुकी है की उन्हें नज़र भी नहीं आयी – सारे कर्मचारी हमारी सुरक्षा के लिए अपनों की चिंता किये बगैर पुरे lockdown एक ढाल बन कर तैनात थी।

सारे देश की आवाम से एक ही गुजारिश रहेगी कि – कृपया करके अपनी सोच को पुराने समय से बाहर लेकर आएं। कम से कम इंसानियत को बरक़रार रखें। अगर समय रहते जीवन के रथ की डोर संभाली नहीं गयी तो विनाश की ओर बढ़ते हुए क़दमों को रोक पाना असंभव हो जायेगा।

Author: by bably kumari

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